Best 55+ | Unique & Epic | Collection Jaun Elia Poetry In Hindi-Urdu

Read the Unique & Epic Collection of the Profound Poet of Jaun Elia Poetry in Hindi-Urdu.

 

Jaun Elia Poetry In Hindi-Urdu

Jaun Elia Poetry In Hindi
Jaun Elia Poetry In Hindi

कैसा दिल और उस के क्या ग़म जी


यूँ ही बातें बनाते हैं हम जी

क्या भला आस्तीन और दामन
कब से पलकें भी अब नहीं नम जी

उससे अब कोई बात क्या करना
खुद से भी बात कीजे कम-कम जी

दिल जो दिल क्या था एक महफ़िल था
अब है दरहम जी और बरहम जी

बात बेतौर हो गयी शायद
ज़ख़्म भी अब नहीं है महरम जी

हार दुनिया से मान लें शायद
दिल हमारे में अब नहीं दम जी

आप से दिल की बात कैसे कहूँ
आप ही तो हैं दिल के महरम’ जी

है ये हसरत कि जिव्ह हो जाऊँ
है शिकन उस शिकम की ज़ालम जी

कैसे आख़िर न रंग खेलें हम
दिल लहू हो रहा है जानम जी

खराबा, हुसैनिया अपना
रोज़ मज्लिस है और मातम जी

वक़्त दम भर का खेल है इस में
बेश-अज़-बेश’ है कम-अज़-कम जी

है अज़ल से अब तलक का हिसाब
और बस एक पल है पैहम जी

बेशिकन हो गयी हैं वो जुल्फें
उस गली में नहीं रहे ख़म जी

दश्ते-दिल का ग़ज़ाल ही न रहा
अब भला किस से कीजिए रम जी

1. बिखरा हुआ, 2. नाराज़, क्रोधित,
3. परिचित,

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बहुत दिल को कुशादा’ कर लिया क्या
ज़माने भर से वादा कर लिया क्या

तो क्या सचमुच जुदाई मुझ से कर ली
तो ख़ुद अपने को आधा कर लिया क्या

हुनरमंदी से अपनी दिल का सफ़हा’
मिरी जां, तुम ने सादा कर लिया क्या

जो यक सर जान है, उस के बदन से
कहो कुछ इस्तिफ़ादा’ कर लिया क्या

बहुत कतरा रहे हो मुम्बचों से
गुनाहे-तर्के-बादा’ कर लिया क्या

यहाँ के लोग कब के जा चुके हैं
सफ़र जादा-ब-जादा कर लिया क्या

उठाया इक क़दम तूने न उस तक
बहुत अपने को मांदा कर लिया क्या

तुम अपनी कजकुलाही’ हार बैठीं?
बदन को बे लबादा कर लिया क्या

बहुत नज़दीक आती जा रही हो
बिछड़ने का इरादा कर लिया क्या

1. विस्तृत, 2. पृष्ठ, 3.लाभान्वित,
4. शराब की सेवा करने वाले बच्चे

5. शराब छोड़ने का गुनाह 6. रास्ते-रास्ते।
7. तिरछी टोपी, मान-अभिमान।

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मिरी शराब का शुहा’ है अब ज़माने में
सो ये करम है तो किस का है, अब भी आ जाओ

ये तौर ! जान जो है मेरी बद शराबी का
मुझे भला नहीं लगता है, अब भी आ जाओ

किसी से कोई भी शिकवा नहीं मगर तुम से
अभी तलक मुझे शिकवा है, अब भी आ जाओ

वो दिल कि अब है लहू थूकना हुनर जिस का
वो कम से कम अभी जिन्दा है, अब भी आ जाओ

न जाने क्या है कि अब तक मिरा ख़ुद अपने से
वही जो था वही रिश्ता है, अब भी आ जाओ

वजूद एक तमाशा था हम जो देखते थे
एक तमाशा है, अब भी आ जाओ

वो अब अभी सदा-ए-जरस- का हुआ आगाज़
गुबार अभी नहीं उट्ठा है, अब भी आ जाओ

है मेरे दिल की गुज़ारिश कि मुझ को मत छोड़ो
ये मेरी जां का तकाज़ा है, अब भी आ जाओ

कभी जो हम ने बड़े मान से बसाया था
वो घर उजड़ने ही वाला है, अब भी आ जाओं

वो ‘जॉन’ कौन है, जाने जो नहीं सुनता
है जाने कौन जो कहता है, अब भी आ जाओ

1. प्रसिद्धि, 2. यात्रियों के साथ चलने वाले जानवर
के गले की घंटे की आवाज़, 3. प्रारम्भ

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Jaun Elia Shayari

कोई नहीं यहाँ खमोश, कोई पुकारता नहीं
शहर में एक शोर है और कोई सदा नहीं

आज वो पढ़ लिया गया जिस को पढ़ा न जा सका
आज किसी किताब में, कुछ भी लिखा हुआ नहीं

अपने सभी गिले बजा, पर है यही कि दिलरुबा
मेरा तिरा मुआमला- इश्क़ के बस का था नहीं

खर्च चलेगा अब मिरा किस के हिसाब में भला
सब के लिये बहुत हूँ मैं, अपने लिये ज़रा नहीं

जाइये ख़ुद में रायगां’ और वो यूँ कि दोस्तां
ज़ात का कोई माजरा, शहर का माजरा नहीं

सीना-ब-सीना लब-ब-लब एक फ़िराक़ है कि है
एक फ़िराक़ है कि है, एक फ़िराक़ क्या नहीं

अपना शुमार कीजियो ऐ मिरी जान ! तू कभी
मैंने भी अपने आप को आज तलक गिना नहीं

तू वो बदन है जिस में जान, आज लगा है जी मिरा
जी तो कहीं लगा तिरा, सुन, तिरा जी लगा नहीं

नाम ही नाम चारसू,’ एक हुजूम रू-ब-रू-
कोई तो हो मिरे सिवा, कोई मिरे सिवा नहीं

अपनी जबीं पे मैंने आज दीं कई बार दस्तकें
कोई पता भी है तिरा, मेरा कोई पता नहीं

1. आवाज़, ध्वनि, 2. सम्बन्ध, 3. व्यर्थ।
4. चारों तरफ़, 5. सन्मुख, 6. ललाट।

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धरम की बाँसुरी से राग निकले
वो सूराख़ों से काले नाग निकले

रखो दैरो-हरम’ को अब मुक़फ़्फ़ल’
कई पागल यहाँ से भाग निकले

वो गंगा जल हो या हो आबे-ज़मज़म’
ये वो पानी हैं जिन आग निकले

ख़ुदा से ले लिया जन्नत का वादा
ये ज़ाहिद तो बड़े ही घाघ निकले

है आख़िर आदमियत भी कोई शै
तिरे दरबान तो बुलडाग निकले

ये क्या अन्दाज़ है ऐ नुक्ताचीनो!
कोई तन्क़ीद तो बेलाग निकले

पिलाया था हमें अमृत किसी ने
मगर मुँह से लहू के झाग निकले

1. मन्दिर और मस्जिद, 2. तालाबन्द,
3. मक्के के पवित्र कुएँ का पानी,
4. संयमी
5. छिद्रान्वेषी, 6.आलोचना।

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John Elia Love Poetry

दिल जो दीवाना नहीं आख़िर को दीवाना भी था
भूलने पर उस को जब आया तो पहचाना भी था

जानिया किस शौक़ में रिश्ते बिछड़ कर रह गये
काम कोई नहीं था पर हमें जाना भी था

अजनबी-सा एक मौसम एक बेमौसम-सी शाम

जब उसे आना नहीं था जब उसे आना भी था

जानिये क्यूँ दिल की वहशत’ दर्मियां में आ गयी

बस यूँ ही हम को बहकना भी था बहकाना भी था

इक महकता-सा वो लम्हा था कि जैसे इक ख़याल
इक ज़माने तक उसी लम्हे को तड़पाना भी था

1. पागलपन।

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कभी-कभी तो बहुत याद आने लगते हो
कि रूठते हो कभी और मनाने लगते हो

गिला तो ये है आते नहीं कभी लेकिन
जब आते भी हो तो फ़ौरन ही जाने लगते हो

ये बात ‘जॉन’ तुम्हारी मज़ाक़ है कि नहीं
कि जो भी हो उसे तुम आज़माने लगते

तुम्हारी शाइरी क्या है भला, भला क्या है
तुम अपने दिल की उदासी को गाने लगते हो

सुना है कहकशानों’ में रोज़ो-शब ही नहीं
तो फिर तुम अपनी ज़ुबां क्यूँ जलाने लगते हो

1. जोन का ढग, 2. आशा, 3. निराशा-सी आशा,
4. नर्म गति से चलना
5. आकाशगंगाओं।

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नयी ख्वाहिश रचाई जा रही है
तिरी फुर्कत मनाई जा रही है

निभाई थी न हम ने जाने किस से
कि अब सब से निभाई जा रही है

हमारे दिल-मुहल्ले की गली से
जा रही है हमारी लाश लाई जा रही है

कहाँ लज्जत वो सोज़े-जुस्तजू की
यहाँ हर चीज़ पाई जा रही है

खुशा’ अहवाल’ अपनी ज़िन्दगी का
सलीले गंवाई जा रही है

दरीचे से था अपने बैर हम को
सो ख़ुद दीमक लगाई जा रही है

जुदाई मौसमों की धूप सुनियो
मिरी क्यारी जलाई जा रही है

मिरी जां अब ये सूरत है कि मुझ से

तिरी आदत छुड़ाई जा रही है

मैं पैहम हार के ये सोचता हूँ
वो क्या शै- है जो हारी जा रही है

1. इच्छा, 2. जुदाई,3. आनन्द, 4. तलाश की जलन,
5. वाह-वाह,6. हाल का बहुवचन,
वृत्तान्त, 7. शिष्टता, 8. झरोखा।
1. निरन्तर, 2. वस्तु

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खुद से हम इक नफ़स हिले भी कहाँ
उस को ढूँढ़े तो वो मिले भी कहाँ

ग़म न होता जो खिल के मुहते
ग़म तो ये है कि हम खिले भी कहाँ

खुश सीने की इन ख़राशों पर
फिर तनफ़्फुस के ये सिले’ भी कहाँ

आगही ने किया हो चाक जिसे
वो गिरेबां भला सिले भी कहाँ

अब ताम्मुल न कर दिले-ख़ुदकाम’
रूठ ले, फिर ये सिल्सिले भी कहाँ

शब खेमा-खेमा गुज़ार ले ये
बामदादां ये क़ाफ़िले भी कहा

आओ, आपस में कुछ गिले कर लें
वरना यूँ है कि फिर गिले भी कहाँ

1. साँस, 2. रगड़, 3. साँसों का आना-जाना,
4. इनाम, प्रतिफल,5. विवेक,
6. असमंजस, विलम्ब,
7. स्वच्छन्द, 8. सवेरा।

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John Elia Poetry Status

सारी दुनिया के ग़म हमारे हैं
और सितम ये कि हम तुम्हारे हैं

दिले-बर्बाद ये यह ख्याल रहे हैं
उसने गेसू ये ख़याल नहीं सँवारे हैं

उन रफ़ीक़ों से शर्म आती है
जो मिरा साथ दे के हारे हैं

और तो हम ने क्या किया अब तक
ये किया है कि दिन गुज़ारे हैं

उस गली से जो हो के आये हों

अब तो वो राहरौं भी प्यारे हैं

‘जॉन’ हम ज़िन्दगी की राहों में
अपनी तन्हारवी के मारे हैं

1. मित्रों, 2. पथिकों,
3. अकेला चलना।

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बेक़रारी-सी बेक़रारी
वस्ल’ है और फ़िराक़’ तारी है

जो गुज़ारी न जा सकी हम से
वो ज़िन्दगी गुज़ारी है

निघरे क्या हुए कि लोगों पर
अपना साया भी अब तो भारी है

बिन तुम्हारे कभी नहीं आयी
क्या मिरी नींद भी तुम्हारी है

आप में कैसे आऊँ मैं तुझ बिन

साँस जो चल रही है, आरी है

उस से कहियो कि दिल की गलियों में

रात-दिन तेरी इन्तज़ारी है

हिज्र हो या विसाल’….कुछ हो

हम हैं और उस की यादगारी है

इक महक सम्ते-दिल से आयी थी

मैं ये समझा तिरी सवारी है

1. मिलन, 2.वियोग, 3. जुदाई,
4. मिलाप, 5. दिल की तरफ से।

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काम की बात मैंने की ही नहीं
ये मिरा तौरे-ज़िन्दगी ही नहीं

ऐ उम्मीद! ऐ उम्मीदे-नौमीदां!
मुझ मय्यत तिरी उठी ही नहीं

मैं जो था उस गली का मस्त ख़िराम’
उस गली में मिरी चली नहीं

ये सुना है कि मेरे कूच के बाद
उस की ख़ुशबू कहीं बसी ही नहीं

थी जो इक फ़ाख़ला उदास-उदास
सुब्ह वो शाख़ से उड़ी ही नहीं

मुझ में अब मेरा जी नहीं लगता
और सितम ये कि मेरा जी ही नहीं

वो जो रहती थी दिल मुहल्ले में
फिर वो लड़की मुझे मिली ही नहीं

जाइये और ख़ाक उड़ाइये आप
अब वो घर क्या कि वो गली ही नहीं

हाय वो शौक़ जो नहीं था कभी
हाय वो ज़िन्दगी जो थी ही नहीं

1. जोन का ढग, 2. आशा,
3. निराशा-सी आशा, 4. नर्म गति से चलना।

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